class 10 History - Notes

Chapter 4 - औद्योगीकरण का युग (The Age of Industrialisation)

1. औद्योगिक क्रांति से पहले (Before the Industrial Revolution)

अक्सर हम सोचते हैं कि औद्योगीकरण का मतलब सिर्फ ‘फैक्ट्री’ है, लेकिन फैक्ट्री आने से पहले भी इंग्लैंड और यूरोप में बड़े पैमाने पर उत्पादन होता था। इसे ‘आदि-औद्योगीकरण’ (Proto-industrialisation) कहते हैं।

  • गाँव में उत्पादन: शहर के व्यापारी (Merchants) गाँवों में जाते थे और किसानों/कारीगरों को पैसा (Advance) देकर उनसे चीजें बनवाते थे।

  • कारण: शहरों में ‘Trade Guilds’ (व्यापारिक संगठन) बहुत ताकतवर थे जो नए लोगों को व्यापार करने से रोकते थे, इसलिए व्यापारियों को गाँव जाना पड़ा।

2. हाथ का श्रम और वाष्प शक्ति (Hand Labour and Steam Power)

शुरुआत में उद्योगपति मशीनों का इस्तेमाल करना पसंद नहीं करते थे। क्यों?

  1. सस्ता मजदूर: उस समय मजदूर बहुत आसानी से और कम कीमत पर मिल जाते थे, इसलिए महंगी मशीनें लगाने की ज़रूरत नहीं थी।

  2. मौसमी काम (Seasonal Labour): कई उद्योगों (जैसे गैस वर्क्स, शराब बनाने वाले) में काम सिर्फ कुछ महीनों का होता था, इसलिए वे मशीनों पर पैसा फँसाना नहीं चाहते थे।

  3. हाथ की कारीगरी: मशीनों से एक जैसी चीजें बनती थीं, जबकि अमीर लोग (Aristocrats) हाथ से बनी बारीक़ नक्काशी वाली चीजें पसंद करते थे।

  • Spinning Jenny: जेम्स हरग्रीव्स ने 1764 में यह मशीन बनाई। इसने कताई की प्रक्रिया तेज कर दी। मजदूरों (खासकर महिलाओं) ने इसका विरोध किया और इन मशीनों पर हमले किए क्योंकि उन्हें बेरोजगारी का डर था।


3. उपनिवेशों में औद्योगीकरण (Industrialisation in the Colonies – India)

भारतीय कपड़े का युग: मशीनों से पहले, अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत के रेशम और सूती कपड़े का दबदबा था।

बुनकरों की दुर्दशा (The Plight of Weavers): जब ईस्ट इंडिया कंपनी की ताकत बढ़ी, तो बुनकरों की हालत खराब हो गई:

  • Gomasthas (गुमाश्ता): कंपनी ने बुनकरों पर निगरानी रखने, माल इकट्ठा करने और क्वालिटी चेक करने के लिए ‘गुमाश्ता’ नाम के वेतनभोगी कर्मचारी नियुक्त किए। वे बुनकरों के साथ बहुत बुरा बर्ताव करते थे।

  • मैनचेस्टर का आना: 19वीं सदी में ब्रिटेन से सस्ता मशीन-निर्मित कपड़ा भारत आने लगा। भारतीय बुनकर इसका मुकाबला नहीं कर सके क्योंकि मशीन का कपड़ा बहुत सस्ता था।


4. भारत में फैक्ट्रियों का आना (Factories Come Up)

भारत में भी उद्योग लगने शुरू हुए:

  • 1854: बंबई (Mumbai) में पहली Cotton Mill लगी।

  • 1855: बंगाल में पहली Jute Mill लगी।

  • प्रारंभिक उद्यमी (Early Entrepreneurs): द्वारकानाथ टैगोर (Bengal), दिनशॉ पेटिट और जमशेदजी टाटा (Bombay), सेठ हुकुमचंद (Marwari businessman) ने चीन के साथ व्यापार करके पैसा कमाया और भारत में फैक्ट्रियां लगाईं।

मजदूर कहाँ से आए? ज्यादातर मजदूर आसपास के जिलों से आते थे। जैसे बंबई की मिलों में रत्नागिरी के किसान काम करने आते थे। उन्हें नौकरी दिलाने में ‘Jobber’ (जॉबर) मदद करता था, जो अक्सर गांव का कोई पुराना और भरोसेमंद व्यक्ति होता था।


5. औद्योगिक विकास का अनूठापन (Peculiarities of Industrial Growth)
  • भारतीय उद्यमियों ने उन चीजों को नहीं बनाया जो ब्रिटिश बनाते थे (ताकि टक्कर न हो)। उन्होंने शुरुआत में Yarn (धागा) बनाया।

  • Swadeshi Movement: 1905 के स्वदेशी आंदोलन ने लोगों को विदेशी कपड़ों का बहिष्कार करने के लिए प्रेरित किया, जिससे भारतीय उद्योगों को फायदा हुआ।

  • First World War: प्रथम विश्व युद्ध ने भारत में औद्योगीकरण की रफ़्तार बढ़ा दी। ब्रिटिश मिलें सेना की ज़रूरतें पूरी करने में व्यस्त थीं, इसलिए भारत के बाजारों में अचानक भारतीय सामान की मांग बढ़ गई (जैसे – वर्दी, बूट, टेंट)।


6. वस्तुओं के लिए बाजार (Market for Goods)

नया माल बेचने के लिए लोगों को प्रेरित करना ज़रूरी था। इसके लिए विज्ञापनों (Advertisements) का सहारा लिया गया।

  • Made in Manchester: कपड़ों के बंडलों पर यह लेबल क्वालिटी की निशानी माना जाता था।

  • Images of Gods: लेबल्स पर भारतीय देवी-देवताओं (कृष्णा, सरस्वती) की तस्वीरें छापी जाती थीं ताकि विदेशी चीज भी अपनी और पवित्र लगे।

  • Calendars: अनपढ़ लोग अखबार नहीं पढ़ सकते थे, इसलिए कैलेंडर्स का इस्तेमाल हुआ जो चाय की दुकानों और गरीब के घरों में भी टंगे होते थे।

  • Gripe Water: बाल कृष्ण की तस्वीर के साथ बच्चों की दवाई ‘Gripe Water’ का विज्ञापन बहुत प्रसिद्ध था।

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