class 10 Economics - Notes
Chapter 2 - भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक (Sectors of the Indian Economy)
हम अपने आस-पास लोगों को अलग-अलग काम करते हुए देखते हैं। कोई खेती कर रहा है, कोई फैक्ट्री में काम कर रहा है, तो कोई दुकान चला रहा है। इन आर्थिक गतिविधियों को समझने के लिए हम इन्हें तीन मुख्य क्षेत्रकों (Sectors) में बांटते हैं।
1. तीन प्रमुख क्षेत्रक (The Three Sectors)
प्राथमिक क्षेत्रक (Primary Sector):
जब हम प्राकृतिक संसाधनों का सीधा उपयोग करके किसी वस्तु का उत्पादन करते हैं।
चूँकि इसमें अधिकतर उत्पाद कृषि, डेयरी, मछली पालन और वनों से मिलते हैं, इसलिए इसे ‘कृषि एवं सहायक क्षेत्रक’ भी कहते हैं।
उदाहरण: गेंहू उगाना, दूध निकालना, खनिज निकालना।
द्वितीयक क्षेत्रक (Secondary Sector):
इसमें प्राकृतिक उत्पादों को विनिर्माण (Manufacturing) के जरिए अन्य रूपों में बदला जाता है। यह अक्सर फैक्ट्रियों या कार्यशालाओं में होता है।
इसे ‘औद्योगिक क्षेत्रक’ भी कहते हैं।
उदाहरण: गन्ने से चीनी बनाना, कपास से कपड़ा बनाना, मिट्टी से ईंट बनाना।
तृतीयक क्षेत्रक (Tertiary Sector):
यह क्षेत्रक कोई ‘वस्तु’ नहीं बनाता, बल्कि उत्पादन प्रक्रिया में मदद (Service) करता है।
इसे ‘सेवा क्षेत्रक’ (Service Sector) भी कहते हैं।
उदाहरण: परिवहन (Transport), बैंकिंग, संचार (Communication), डॉक्टर, शिक्षक, सॉफ्टवेयर इंजीनियर।
2. तीन क्षेत्रकों की तुलना (Comparing the Three Sectors)
हम यह कैसे जानते हैं कि कौन सा क्षेत्रक कितना बड़ा है? इसके लिए हम सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का इस्तेमाल करते हैं।
GDP (Gross Domestic Product): किसी विशेष वर्ष में, देश के भीतर उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का कुल मूल्य GDP कहलाता है।
ध्यान दें: हम केवल ‘अंतिम वस्तुओं’ (Final Goods) को गिनते हैं।
क्यों: जैसे बिस्कुट (अंतिम वस्तु) के दाम में आटा और चीनी (मध्यवर्ती वस्तु) का दाम पहले से जुड़ा होता है। अगर हम आटे को अलग से गिनेंगे, तो वह दो बार गिना जाएगा (Double Counting)।
ऐतिहासिक बदलाव (Historical Shift): विकसित देशों के इतिहास में देखा गया है कि शुरुआत में प्राथमिक क्षेत्रक सबसे महत्वपूर्ण था। जैसे-जैसे खेती के तरीके सुधरे और फैक्ट्रियां आईं, लोग द्वितीयक क्षेत्रक में गए। पिछले 100 वर्षों में, अब सबसे ज्यादा लोग तृतीयक (सेवा) क्षेत्रक में काम कर रहे हैं।
3. भारत में क्षेत्रकों का बदलाव (Scenario in India)
भारत में एक अजीब स्थिति है:
GDP में हिस्सेदारी: तृतीयक (सेवा) क्षेत्रक सबसे बड़ा हो गया है। यह GDP का 50% से ज्यादा हिस्सा देता है।
रोजगार में हिस्सेदारी: लेकिन रोजगार के मामले में आज भी प्राथमिक (कृषि) क्षेत्रक सबसे बड़ा है। भारत की लगभग आधी आबादी (44-49%) खेती में लगी है, लेकिन वे GDP में सिर्फ 1/6 हिस्सा ही देते हैं।
सेवा क्षेत्रक क्यों बढ़ रहा है?
बुनियादी सेवाओं (अस्पताल, पुलिस, स्कूल, बैंक) की मांग बढ़ रही है।
खेती और उद्योग के विकास से परिवहन और व्यापार की मांग बढ़ती है।
लोगों की आय बढ़ने से वे बाहर खाना, पर्यटन और शॉपिंग की मांग करते हैं।
सूचना प्रौद्योगिकी (IT) का बूम।
4. बेरोजगारी के प्रकार (Types of Unemployment)
भारत में कृषि क्षेत्र में एक खास तरह की समस्या है।
अल्प-बेरोजगारी / प्रच्छन्न बेरोजगारी (Disguised Unemployment):
यह वह स्थिति है जहाँ लोग काम करते हुए तो दिखाई देते हैं, लेकिन अपनी क्षमता से कम काम करते हैं।
उदाहरण: एक खेत में काम करने के लिए 5 लोगों की जरूरत है, लेकिन परिवार के 8 लोग वहां लगे हुए हैं। अगर 3 लोगों को हटा भी दें, तो उत्पादन कम नहीं होगा। वे 3 लोग ‘छिपे हुए बेरोजगार’ हैं।
रोजगार कैसे बढ़ाएं?
सस्ती साख (Credit): किसानों को कम ब्याज पर कर्ज देना ताकि वे समय पर बीज-खाद खरीद सकें।
आधारभूत ढांचा: गांवों में सड़कें और बांध बनाना, जिससे निर्माण कार्य में रोजगार मिले।
स्थानीय उद्योग: दाल मिल या कोल्ड स्टोरेज खोलना।
पर्यटन और IT: नीति आयोग के अनुसार, पर्यटन क्षेत्र में लाखों नए रोजगार बन सकते हैं।
5. संगठित और असंगठित क्षेत्रक (Organized vs Unorganized)
काम की शर्तों के आधार पर अर्थव्यवस्था दो भागों में बंटी है:
संगठित क्षेत्रक (Organized Sector):
वे उद्यम जहाँ रोजगार की शर्तें तय होती हैं।
ये सरकार द्वारा पंजीकृत (Registered) होते हैं और नियमों (जैसे- न्यूनतम मजदूरी कानून) का पालन करते हैं।
फायदे: रोजगार की सुरक्षा, काम के घंटे निश्चित, सवेतन छुट्टी (Paid Leave), भविष्य निधि (PF), रिटायरमेंट पर पेंशन।
उदाहरण: बैंक कर्मचारी, सरकारी स्कूल का शिक्षक, बड़ी फैक्ट्री का वर्कर।
असंगठित क्षेत्रक (Unorganized Sector):
छोटी-छोटी बिखरी हुई इकाइयां जो अक्सर सरकारी नियंत्रण से बाहर होती हैं।
यहाँ नियम तो होते हैं पर पालन नहीं होता।
नुकसान: कम वेतन, रोजगार की सुरक्षा नहीं (कभी भी नौकरी से निकाल सकते हैं), कोई छुट्टी नहीं, बीमारी की कोई छुट्टी नहीं।
उदाहरण: सड़क पर ठेला लगाने वाले, खेतिहर मजदूर, कबाड़ बिनने वाले।
6. मनरेगा 2005 (MGNREGA 2005)
रोजगार के अधिकार को लागू करने के लिए सरकार ने एक कानून बनाया: ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम 2005’
उद्देश्य: ग्रामीण भारत में लोगों की आजीविका सुरक्षित करना।
गारंटी: साल में कम से कम 100 दिनों के रोजगार की गारंटी।
बेरोजगारी भत्ता: अगर सरकार 15 दिन के अंदर रोजगार नहीं दे पाती, तो वह व्यक्ति को दैनिक बेरोजगारी भत्ता देगी।
इसमें उन कामों को वरीयता दी जाती है जिनसे भविष्य में जमीन की पैदावार बढ़े (जैसे तालाब खोदना, मेड़ बनाना)।