class 10 Hindi - Notes
Chapter 4 - मानवीय करुणा की दिव्य चमक
हिंदी (क्षितिज) पाठ 13: मानवीय करुणा की दिव्य चमक
लेखक: सर्वेश्वर दयाल सक्सेना विधा: संस्मरण मुख्य पात्र: फादर कामिल बुल्के
1. पाठ परिचय
इस पाठ में लेखक ने फादर कामिल बुल्के को “मानवीय करुणा की दिव्य चमक” कहा है। वे एक ऐसे व्यक्ति थे जिनके दिल में सभी के लिए ममता और अपनापन था। वे एक बड़े छायादार पेड़ (देवदारु) की तरह थे, जिसकी छाया में सबको शांति मिलती थी। यद्यपि उनका जन्म यूरोप (बेल्जियम) में हुआ था, लेकिन उन्होंने भारत को ही अपनी कर्मभूमि माना।
2. फादर बुल्के का व्यक्तित्व (बाहरी और आंतरिक)

वेशभूषा: फादर बुल्के हमेशा एक सफेद चोग़ा (पादरी वाला लंबा लबादा) पहनते थे।
शारीरिक बनावट: उनका रंग गोरा था, चेहरे पर सफेद झलकाती हुई भूरी दाढ़ी थी और आंखें नीली थीं। उनकी बाहें हमेशा दूसरों को गले लगाने के लिए खुली रहती थीं।
स्वभाव: वे कभी क्रोध नहीं करते थे। उनके अंदर केवल ममता और प्यार भरा था। लेखक के साथ उनके पारिवारिक संबंध थे। वे हंसी-मजाक में शामिल होते, गोष्ठियों (साहित्यिक चर्चाओं) में गंभीर बहस करते और लेखकों की रचनाओं पर बेबाक राय देते थे।
3. बेल्जियम से भारत का सफर
फादर बुल्के का घर बेल्जियम के ‘रेम्सचैपल’ शहर में था।
इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़ी: वे इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष में थे जब अचानक उनके मन में संन्यासी बनने की इच्छा जागी।
भारत आने की शर्त: जब उन्होंने धर्मगुरु से संन्यास लेने की बात की, तो उन्होंने एक शर्त रखी कि वे भारत जाएंगे। (शायद भारत की आध्यात्मिक संस्कृति ने उन्हें आकर्षित किया था)।
परिवार: उनके परिवार में माता-पिता, दो भाई और एक बहन थी। वे अपनी माँ को बहुत याद करते थे और अक्सर उनकी चिट्ठियां आती थीं। पिता व्यवसायी थे। एक भाई पादरी हो गया था और दूसरा परिवार के साथ रहता था। बहन बहुत जिद्दी थी।
4. हिंदी प्रेम और शोध कार्य
भारत आकर उन्होंने जी-जान से हिंदी की सेवा की।
पढ़ाई: उन्होंने पहले ‘जिसेट संघ’ में रहकर धर्माचार की पढ़ाई की, फिर कलकत्ता (कोलकाता) से बी.ए. और इलाहाबाद से एम.ए. किया।
शोध (PhD): उन्होंने प्रयाग विश्वविद्यालय से “रामकथा: उत्पत्ति और विकास” विषय पर शोध किया।
शब्दकोश: उन्होंने प्रसिद्ध “अंग्रेजी-हिंदी शब्दकोश” (Dictionary) तैयार किया और बाइबिल का हिंदी अनुवाद भी किया।
हिंदी के लिए दर्द: उन्हें हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में न देख पाने पर बहुत दुख होता था। वे इस बात पर झुंझलाते थे कि हिंदी वाले ही हिंदी की उपेक्षा करते हैं। वे हर मंच से हिंदी की वकालत करते थे।
5. बीमारी और दुखद अंत
फादर बुल्के को एक खराब बीमारी (गैंग्रीन – एक प्रकार का फोड़ा) हो गई थी।
लेखक को इस बात का बहुत दुख था कि जिस इंसान ने जीवन भर दूसरों को “अमृत” (प्रेम) बांटा, उसे अंत समय में इतनी यातना (दर्द) क्यों मिली?
18 अगस्त 1982 को दिल्ली के कश्मीरी गेट के निकलसन कब्रगाह में उनका अंतिम संस्कार किया गया।
अंत्येष्टि: उनका अंतिम संस्कार मसीही विधि से हुआ, लेकिन हिंदी साहित्य के कई बड़े विद्वान (जैसे जैनेंद्र कुमार, विजयेंद्र स्नातक, रघुवंश जी) वहां मौजूद थे।
6. निष्कर्ष: नम आँखों को गिनना स्याही फैलाना है
लेखक अंत में कहते हैं कि फादर की मृत्यु पर रोने वालों की कमी नहीं थी। वहां इतने लोग रो रहे थे कि उनके नामों की गिनती करना स्याही फैलाने (व्यर्थ प्रयास) जैसा है। फादर बुल्के आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन वे उस पवित्र अग्नि की तरह हैं जो हमेशा हमारी यादों में गर्माहट बनाए रखेंगे। वे एक विदेशी होकर भी सबसे अधिक भारतीय थे।