कक्षा 10 हिंदी महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर

पाठ 3 - लखनवी अंदाज़

पाठ परिचय: लेखक यशपाल एक नई कहानी सोचने के लिए ट्रेन के ‘सैकंड क्लास’ के डिब्बे में चढ़ते हैं, जहाँ उन्हें एकांत की उम्मीद थी। वहां पहले से एक नवाब साहब बैठे थे। नवाब साहब के सामने दो खीरे रखे थे। लेकिन लेखक के आ जाने से नवाब साहब को संकोच हुआ कि एक ‘मामूली’ आदमी उन्हें खीरा खाते देख लेगा। अपनी ‘नवाबी शान’ दिखाने के लिए उन्होंने खीरे को बड़े सलीके से काटा, उस पर नमक-मिर्च बुरका, सूंघा और फिर खिड़की से बाहर फेंक दिया। यह कहानी बनावटी जीवनशैली पर करारी चोट है।


Q1. नवाब साहब ने सैकंड क्लास (Second Class) का टिकट क्यों खरीदा होगा? लेखक का क्या अनुमान था?

उत्तर: लेखक ने अनुमान लगाया कि नवाब साहब ने सैकंड क्लास का टिकट दो वजहों से खरीदा होगा:

  1. भीड़ से बचने के लिए: वे भीड़भाड़ से दूर एकांत में यात्रा करना चाहते होंगे ताकि वे आराम से बैठ सकें।

  2. किफायत: हो सकता है कि वे पैसे बचाना चाहते हों, लेकिन जनरल डिब्बे में सफर करके अपनी शान कम नहीं करना चाहते थे।

  3. खीरे का शौक: उन्होंने सोचा होगा कि इस एकांत डिब्बे में बैठकर वे आराम से खीरे खाने का शौक पूरा कर सकेंगे, बिना किसी की नज़रों में आए। लेकिन लेखक के अचानक आ जाने से उनकी एकांत और गोपनीयता (Privacy) में खलल पड़ गया।

Q2. लेखक के डिब्बे में आते ही नवाब साहब की आँखों में कैसा भाव दिखाई दिया?

उत्तर: जैसे ही लेखक डिब्बे में दाखिल हुए, नवाब साहब की आँखों में असंतोष और असहजता का भाव साफ दिखाई दिया। वे बिल्कुल भी खुश नहीं हुए। उन्हें लगा कि लेखक के आने से उनका एकांत भंग हो गया है। सबसे बड़ी बात यह थी कि उनके सामने ‘खीरे’ जैसी मामूली वस्तु रखी थी। उन्हें शर्मिंदगी महसूस हुई कि एक सफेदपोश सज्जन (लेखक) उन्हें खीरा खाते हुए देखेगा। उन्हें डर था कि कहीं उनकी ‘नवाबी शान’ में बट्टा न लग जाए। इसलिए उन्होंने लेखक से बात करने में कोई उत्साह नहीं दिखाया और खिड़की से बाहर देखने लगे।

Q3. नवाब साहब ने खीरे को खाने योग्य बनाने के लिए क्या-क्या तैयारियां कीं? (वर्णन करें)

उत्तर: नवाब साहब ने खीरे को बहुत ही नफासत (Refinement) और शाही अंदाज से तैयार किया:

  1. सबसे पहले उन्होंने खीरों को खिड़की से बाहर निकालकर लोटे के पानी से धोया और तौलिए से पोंछा।

  2. फिर जेब से चाकू निकाला और खीरे के दोनों सिरों को काटकर, उन्हें गोदकर झाग निकाला (ताकि कड़वाहट निकल जाए)।

  3. इसके बाद उन्होंने खीरों को बहुत ही एहतियात से छीला और उनकी पतली-पतली फाँकें (Slices) काटीं।

  4. उन फाँकों को तौलिए पर करीने से सजाया और उन पर जीरा-मिला नमक और लाल मिर्च की सुर्खी बुरक दी। यह पूरी प्रक्रिया उनके ‘लखनवी अंदाज’ और खान-पान के सलीके को दिखा रही थी।

Q4. नवाब साहब ने खीरे की फाँकों को खिड़की से बाहर क्यों फेंक दिया?

उत्तर: नवाब साहब ने खीरे को खाने की बजाय खिड़की से बाहर इसलिए फेंक दिया ताकि वे लेखक के सामने अपनी ‘खानदानी रईसी’ का प्रदर्शन कर सकें। वे यह जताना चाहते थे कि खीरा जैसी तुच्छ (सस्ती) चीज़ खाना नवाबों का काम नहीं है। नवाब तो केवल उसकी खुश्बू (सुगंध) से ही पेट भर लेते हैं। खीरे को खाना उन्हें अपनी शान के खिलाफ लगा, खासकर तब जब सामने कोई दूसरा व्यक्ति बैठा हो। यह उनका कोरा दिखावा और झूठी प्रतिष्ठा (False Prestige) थी, जिसके लिए उन्होंने खाने की चीज़ को बर्बाद कर दिया।

Q5. “पेट भरे होने का डकार” — इस घटना का लेखक पर क्या प्रभाव पड़ा?

उत्तर: नवाब साहब ने जब खीरे की फाँक को सिर्फ सूंघा और खिड़की से बाहर फेंक दिया, तो उसके बाद उन्होंने एक गहरी डकार ली, मानो उनका पेट भर गया हो। यह देखकर लेखक हैरान रह गए। उन्होंने सोचा कि क्या सिर्फ सूंघने मात्र से (गंध और स्वाद की कल्पना से) पेट भर सकता है? यह तो ‘सूक्ष्म भोजन’ (Abstract consumption) हुआ। लेखक ने इस घटना से यह निष्कर्ष निकाला कि अगर बिना खाए पेट भर सकता है, तो बिना विचार, घटना और पात्रों के कहानी भी लिखी जा सकती है। यह लेखक का व्यंग्य था कि नवाब साहब का व्यवहार वास्तविकता से कितना दूर था।

Q6. “लखनवी अंदाज़” शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: इस पाठ का शीर्षक ‘लखनवी अंदाज़’ बिल्कुल सटीक और सार्थक है। पूरी कहानी लखनऊ के एक नवाब साहब के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपनी हर हरकत में एक विशेष ‘अंदाज़’ (Style) बनाए रखते हैं। उनका बैठने का तरीका, खीरे को धोने और काटने की नफासत, और अंत में उसे बिना खाए फेंक देना—यह सब उनके बनावटी और दिखावटी स्वभाव को दर्शाता है। यह शीर्षक उस विशेष संस्कृति (लखनवी तहजीब) पर एक कटाक्ष है, जहाँ वास्तविकता से ज्यादा ‘दिखावे’ और ‘नज़ाकत’ को महत्व दिया जाता है। इसलिए यह शीर्षक पूरी तरह उपयुक्त है।

Q7. इस पाठ के माध्यम से लेखक ने समाज के किस वर्ग पर कटाक्ष (व्यंग्य) किया है?

उत्तर: यशपाल जी ने इस पाठ के जरिए समाज के ‘पतनशील सामंती वर्ग’ (Feudal Class) पर गहरा कटाक्ष किया है। यह वो वर्ग है जिसकी ज़मीन-जायदाद और नवाबी अब खत्म हो चुकी है, लेकिन उनकी अकड़ और आदतें अभी भी नहीं गई हैं। वे आज भी अतीत की झूठी शान में जीते हैं और वास्तविकता को स्वीकार नहीं करना चाहते। जैसे नवाब साहब के पास अब शायद उतने पैसे नहीं हैं (तभी तो सैकंड क्लास और खीरा चुना), लेकिन दिखावा ऐसा कि जैसे वे अब भी रियासत के मालिक हों। यह कहानी ऐसे ही बनावटी जीवन जीने वालों की पोल खोलती है।

Q8. लेखक को नवाब साहब के मुंह में पानी आना क्यों स्वाभाविक लगा, लेकिन फिर भी नवाब साहब ने खीरा क्यों नहीं खाया?

उत्तर: खीरे पर लगा नमक-मिर्च और उसकी ताज़गी देखकर किसी के भी मुंह में पानी आना स्वाभाविक है (इसे ‘पनियाती आँखें’ कहा गया है)। नवाब साहब का मन भी खीरा खाने के लिए ललचा रहा था। लेकिन समस्या यह थी कि वे पहले ही लेखक के पूछने पर खीरा खाने से मना कर चुके थे (“वल्लाह! आप शौक फरमाएं”)। अब अगर वे खीरा खाते, तो लेखक क्या सोचता? अपनी बात की लाज रखने और खुद को लेखक से ‘ऊँचा’ साबित करने के अहंकार में उन्होंने अपनी इच्छा (तलब) को मार दिया और खीरे फेंक दिए। यह दिखाता है कि दंभ (Ego) इंसान से कैसे-कैसे काम करवाता है।


एग्जाम टिप (Pro Tip): इस पाठ से चरित्र-चित्रण (Character Sketch) का प्रश्न आ सकता है। नवाब साहब के बारे में लिखें: “दिखावटी, रईस बनने का ढोंग करने वाले, नज़ाकत पसंद और अहंकारी।” साथ ही, “बिना विचार, घटना और पात्रों के भी क्या कहानी लिखी जा सकती है?” वाली पंक्ति का आशय ज़रूर तैयार करें, यह लेखक का मुख्य व्यंग्य है।

शुभकामनाएं!

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