कक्षा 10 हिंदी महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर

पाठ 6 - नौबतखाने में इबादत

पाठ परिचय: ‘नौबतखाने में इबादत’ का अर्थ है— प्रवेश द्वार (Deorhi) के ऊपर बने स्थान पर बैठकर ईश्वर की प्रार्थना करना। बिस्मिल्ला खान साहब का बचपन काशी (वाराणसी) में बीता। वे पक्के मुसलमान थे, पाँचों वक्त की नमाज पढ़ते थे, लेकिन उनकी शहनाई काशी विश्वनाथ मंदिर और बालाजी मंदिर की दहलीज पर ही बजती थी। वे सादगी की मिसाल थे। भारत रत्न मिलने के बाद भी वे फटी लुंगी पहनते थे। यह पाठ गंगा-जमुनी तहजीब (मिली-जुली संस्कृति) का बेहतरीन उदाहरण है।


Q1. शहनाई की दुनिया में ‘डुमरांव’ को क्यों याद किया जाता है?

उत्तर: शहनाई की दुनिया में डुमरांव (बिहार का एक गाँव) का महत्व दो कारणों से है:

  1. बिस्मिल्ला खान का जन्मस्थान: विश्व प्रसिद्ध शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खान का जन्म इसी डुमरांव गाँव में हुआ था। उनकी शहनाई की गूंज यहीं से शुरू हुई थी।

  2. सोन नदी की नरकट घास: शहनाई बजाने के लिए जिस ‘रीड’ (Narkat) का प्रयोग होता है (जो फूंक मारने पर बजती है), वह घास डुमरांव में बहने वाली सोन नदी के किनारे ही पाई जाती है। इस घास के बिना शहनाई नहीं बज सकती। इसलिए शहनाई और डुमरांव का रिश्ता बहुत गहरा है।

Q2. बिस्मिल्ला खान को ‘शहनाई की मंगलध्वनि का नायक’ क्यों कहा जाता है?

उत्तर: शहनाई को ‘मंगलध्वनि’ (शुभ कार्यों का वाद्य) माना जाता है। भारत में कोई भी शुभ काम हो—जैसे शादी-विवाह, मुंडन या त्योहार—बिना शहनाई के अधूरा लगता है। उस्ताद बिस्मिल्ला खान ने इस वाद्य यंत्र को सिर्फ शादी-ब्याह तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे शास्त्रीय संगीत (Classical Music) के मंच पर एक ऊंचा स्थान दिलाया। उन्होंने शहनाई को इतनी खूबसूरती से बजाया कि वह पूरी दुनिया में मशहूर हो गई। चूंकि वे शहनाई बजाने में सबसे श्रेष्ठ थे और शहनाई मंगल कार्यों का प्रतीक है, इसलिए उन्हें ‘मंगलध्वनि का नायक’ कहा जाता है।

Q3. “सुषिर-वाद्य” किसे कहते हैं? शहनाई को ‘शाहनेय’ की उपाधि क्यों मिली होगी?

उत्तर:

  • सुषिर-वाद्य: वे वाद्य यंत्र जिन्हें फूंक मारकर बजाया जाता है (जैसे—बांसुरी, शहनाई, बीन), उन्हें ‘सुषिर-वाद्य’ कहा जाता है।

  • शाहनेय का अर्थ: अरब देशों में फूंक कर बजाए जाने वाले वाद्य यंत्रों को ‘नय’ (Ney) कहा जाता है। शहनाई इन सभी वाद्य यंत्रों में सबसे सुरीली और श्रेष्ठ (शाह/राजा) मानी गई। इसलिए इसे ‘शाह’ + ‘नय’ = ‘शाहनेय’ (शहनाई) कहा गया। यानी यह “सुषिर वाद्यों की रानी” है। 16वीं शताब्दी में तानसेन द्वारा रची गई बंदिशों में भी शहनाई का ज़िक्र मिलता है, जो इसकी प्राचीनता को दर्शाता है।

Q4. बिस्मिल्ला खान अपने खुदा (ईश्वर) से क्या माँगते थे?

उत्तर: बिस्मिल्ला खान साहब बहुत बड़े कलाकार थे और उन्हें भारत रत्न मिल चुका था, फिर भी उनमें रत्ती भर भी घमंड नहीं था। वे जब भी नमाज पढ़ते, तो खुदा से धन-दौलत या लंबी उम्र नहीं मांगते थे। वे गिड़गिड़ाकर बस एक ही दुआ मांगते थे— “मेरे मालिक! मुझे एक सच्चा सुर बख्श दे। मेरे सुर में इतनी तासीर (असर) पैदा कर कि उसे सुनकर लोगों की आँखों से सच्चे मोती (आँसू) निकल आएं।” उनका मानना था कि “लुंगी तो फट जाए तो सिली जा सकती है, लेकिन अगर सुर फट गया तो उसे कोई नहीं सिल सकता।” यह उनकी संगीत के प्रति सच्ची साधना को दिखाता है।

Q5. “काशी में संगीत आयोजन की एक प्राचीन एवं अद्भुत परंपरा है” — इस प्रसंग का उल्लेख करें।

उत्तर: काशी (बनारस) सिर्फ मंदिरों का शहर नहीं, बल्कि संगीत का गढ़ भी है। यहाँ पिछले कई वर्षों से संकटमोचन मंदिर में ‘हनुमान जयंती’ के अवसर पर एक भव्य संगीत समारोह होता है। यह कार्यक्रम पाँच दिनों तक चलता है जिसमें देश के बड़े-बड़े गायक और संगीतकार हिस्सा लेते हैं। उस्ताद बिस्मिल्ला खान की इस आयोजन में गहरी आस्था थी। वे भले ही दुनिया के किसी भी कोने में हों, लेकिन इन दिनों वे काशी ज़रूर आते थे और अपनी शहनाई बजाकर ही हाजिरी लगाते थे। यह परंपरा दिखाती है कि काशी में धर्म और संगीत एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

Q6. बिस्मिल्ला खान के व्यक्तित्व की कौन-सी बातों ने आपको सबसे ज्यादा प्रभावित किया?

उत्तर: बिस्मिल्ला खान का जीवन हम सबके लिए प्रेरणा है। उनकी कुछ खास बातें दिल छू लेती हैं:

  1. अद्भुत सादगी: दुनिया भर में मशहूर होने के बावजूद वे बहुत ही साधारण तरीके से रहते थे। वे अक्सर फटी हुई लुंगी पहने दिख जाते थे। बनावटीपन उन्हें छू भी नहीं गया था।

  2. धार्मिक उदारता: वे पक्के मुसलमान थे, लेकिन काशी विश्वनाथ और बालाजी के प्रति उनकी श्रद्धा किसी हिंदू भक्त से कम नहीं थी। वे गंगा को अपनी माँ मानते थे।

  3. संगीत के प्रति समर्पण: 80-90 साल की उम्र में भी वे रियाज़ (अभ्यास) करना नहीं छोड़ते थे और हमेशा ईश्वर से बेहतर सुर मांगते रहते थे।

Q7. शिष्या द्वारा नई लुंगी पहनने के आग्रह पर बिस्मिल्ला खान ने क्या जवाब दिया?

उत्तर: एक बार उनकी एक शिष्या ने उन्हें फटी हुई लुंगी में देखकर टोका कि “बाबा! आपको भारत रत्न मिल चुका है, आप इतनी फटी लुंगी मत पहना करिए, अच्छा नहीं लगता।” इस पर खान साहब ने बहुत ही प्यारा जवाब दिया। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा— “पगली! भारत रत्न हमको शहनईया पे मिला है, लुंगिया पे नाहीं।” उनका मतलब था कि इंसान की पहचान उसके कपड़ों से नहीं, बल्कि उसके हुनर और काम से होती है। अगर वे बनाव-श्रृंगार में लग जाते, तो इतनी अच्छी शहनाई कभी नहीं बजा पाते। वे कहते थे कि “मालिक से यही दुआ है कि फटा सुर न दे, लुंगी का क्या है, आज फटी है तो कल सिल जाएगी।”

Q8. मुहर्रम से बिस्मिल्ला खान के जुड़ाव को अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर: बिस्मिल्ला खान शिया मुसलमान थे और मुहर्रम के महीने में वे बहुत शोक मनाते थे। मुहर्रम के दस दिनों तक उनके घर में कोई संगीत का कार्यक्रम नहीं होता था और न ही शहनाई बजाई जाती थी। आठवीं तारीख को वे खड़े होकर शहनाई बजाते थे और दालमंडी से फातमान तक (करीब 8 किलोमीटर) पैदल रोते हुए जाते थे। उस दिन वे कोई राग-रागिनी नहीं बजाते थे, बल्कि उनकी शहनाई से सिर्फ दर्द भरी धुन निकलती थी, जिसे सुनकर सबकी आँखें नम हो जाती थीं। यह उनके धार्मिक जुड़ाव और संवेदनशीलता को दर्शाता है।


एग्जाम टिप (Pro Tip): इस पाठ से ‘मूल्य-परक’ (Value-based) प्रश्न आ सकता है: “बिस्मिल्ला खान का जीवन साम्प्रदायिक सद्भाव (Communal Harmony) की मिसाल कैसे है?” उत्तर में लिखें: “वे एक मुसलमान होकर भी काशी के मंदिरों में शहनाई बजाते थे और गंगा को पवित्र मानते थे। उनके लिए संगीत का कोई धर्म नहीं था, वह सबको जोड़ने वाला माध्यम था। आज के समाज को उनसे यही सीख लेनी चाहिए।”

शुभकामनाएं!

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