कक्षा 10 हिंदी महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर
पाठ 2 - बालगोबिन भगत
पाठ परिचय: ‘बालगोबिन भगत’ 60 वर्ष से ऊपर के एक मंझोले कद के गोरे-चिट्टे आदमी थे। वे कबीरपंथी थे और माथे पर रामानंदी चंदन लगाते थे। खेती-बाड़ी और परिवार होने के बावजूद उनका जीवन किसी सन्यासी से कम नहीं था। उनके मधुर गायन और क्रांतिकारी विचारों ने उन्हें अमर बना दिया। यह पाठ हमें सिखाता है कि सन्यास का संबंध ‘त्याग’ से है, ‘वेशभूषा’ से नहीं।
Q1. खेतीबारी से जुड़े गृहस्थ बालगोबिन भगत अपनी किन चारित्रिक विशेषताओं के कारण ‘साधु’ कहलाते थे?
उत्तर: बालगोबिन भगत का जीवन ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ का बेहतरीन उदाहरण था। वे गृहस्थ (परिवार वाले) थे, फिर भी लोग उन्हें साधु मानते थे क्योंकि:
कबीर के आदर्श: वे कबीर को अपना ‘साहब’ (ईश्वर) मानते थे और उन्हीं के बताए रास्ते पर चलते थे।
सत्य और स्पष्टवादिता: वे कभी झूठ नहीं बोलते थे और सबसे खराब व्यवहार करते थे। वे किसी की चीज़ बिना पूछे नहीं छूते थे।
त्याग की भावना: वे अपनी फसल को सबसे पहले सिर पर लादकर कबीर मठ (दरबार) ले जाते थे और ‘भेंट’ चढ़ा देते थे। वहां से जो कुछ ‘प्रसाद’ के रूप में वापस मिलता, उसी से अपना गुजर-बसर करते थे। उनका यह निस्वार्थ और पवित्र आचरण ही उन्हें असली साधु बनाता था।
Q2. भगत की पुत्रवधू (बहू) उन्हें अकेले क्यों नहीं छोड़ना चाहती थी?
उत्तर: भगत के बेटे की मृत्यु के बाद, वे बिल्कुल अकेले रह गए थे। उनकी पतोहू (बहू) एक बहुत ही समझदार और सुशील महिला थी। वह उन्हें छोड़कर अपने मायके नहीं जाना चाहती थी क्योंकि उसे चिंता थी कि:
“बुढ़ापे में इस अकेले बुजुर्ग के लिए खाना कौन बनाएगा?”
“अगर ये बीमार पड़ गए, तो इन्हें पानी देने वाला भी कोई नहीं होगा।” वह अपना पूरा जीवन भगत की सेवा में बिताना चाहती थी ताकि उन्हें कोई कष्ट न हो। यह उसका अपने ससुर के प्रति सम्मान और जिम्मेदारी का भाव था।
Q3. बालगोबिन भगत ने अपने बेटे की मृत्यु पर अपनी भावनाएं किस तरह व्यक्त कीं? (महत्वपूर्ण प्रश्न)
उत्तर: जब भगत का इकलौता बेटा (जो थोड़ा सुस्त और बोदा था) मर गया, तो उन्होंने कोई रोना-धोना नहीं किया। उनका व्यवहार बहुत ही अनोखा था:
उन्होंने बेटे के शव को आँगन में चटाई पर लिटाकर सफेद कपड़े से ढक दिया और उस पर कुछ फूल और तुलसी दल बिखेर दिए।
वे शव के पास बैठकर ज़ोर-ज़ोर से कबीर के भक्ति गीत गाने लगे।
उन्होंने अपनी रोती हुई पतोहू को भी चुप कराया और कहा कि “यह रोने का नहीं, उत्सव मनाने का समय है।” उनका तर्क था कि आज “आत्मा अपने परमात्मा से जा मिली है।” विरहिनी (आत्मा) अपने प्रेमी (ईश्वर) से मिल गई है, जो सबसे बड़े आनंद की बात है। यह मृत्यु के प्रति उनका आध्यात्मिक नज़रिया था।
Q4. भगत के गायन का खेत में काम करने वालों और आसपास के लोगों पर क्या प्रभाव पड़ता था?
उत्तर: बालगोबिन भगत का कंठ (गला) बहुत सुरीला था। आषाढ़ की रिमझिम बारिश में जब वे धान की रोपाई करते समय गीत गाते थे, तो पूरा माहौल बदल जाता था:
बच्चे: खेलते हुए बच्चे उनके संगीत की लय पर झूमने लगते थे।
महिलाएं: मेड़ पर बैठी औरतों के होंठ अपने आप कांपने लगते थे और वे भी गुनगुनाने लगती थीं।
हलवाहे: हल चलाने वाले किसानों के पैर संगीत की ताल के साथ उठने लगते थे।
रोपाई करने वाले: धान रोपने वालों की उंगलियां एक विशेष क्रम में चलने लगती थीं। उनका संगीत थके हुए लोगों में एक नया जोश और जादू भर देता था।
Q5. पाठ के आधार पर बताएं कि बालगोबिन भगत ने समाज की किन प्रचलित मान्यताओं को तोड़ा? (Social Reforms)
उत्तर: बालगोबिन भगत एक प्रगतिशील विचारक थे। उन्होंने उस ज़माने में समाज की कई सड़ी-गली परंपराओं (रूढ़ियों) को तोड़ा:
स्त्रियों द्वारा मुखाग्नि: हिंदू धर्म में चिता को आग पुरुष देते हैं, लेकिन भगत ने अपने बेटे की चिता को आग अपनी ‘पतोहू’ (बहू) से दिलवाई। यह एक क्रांतिकारी कदम था।
विधवा विवाह: बेटे के श्राद्ध की अवधि पूरी होते ही उन्होंने पतोहू के भाई को बुलाया और आदेश दिया कि “इसकी दूसरी शादी कर देना।” उस समय विधवा विवाह बहुत बड़ी बात थी।
मृत्यु का उत्सव: जहां लोग मौत पर रोते हैं, उन्होंने उसे ‘उत्सव’ मानकर आत्मा की मुक्ति का जश्न मनाया।
Q6. बालगोबिन भगत की दिनचर्या लोगों के अचरज (हैरानी) का कारण क्यों थी?
उत्तर: भगत जी नियमों के बहुत पक्के थे। चाहे कितनी भी कड़ाके की सर्दी हो या गर्मी, उनकी दिनचर्या कभी नहीं बदलती थी।
सुबह जल्दी उठना: वे भोर में (सुबह 4-5 बजे) उठकर, दो मील दूर नदी में जाकर स्नान करते थे।
प्रभाती गाना: लौटकर वे गाँव के बाहर पोखरे के ऊँचे भिंडे पर बैठकर अपनी खंजड़ी बजाते और ‘प्रभाती’ (सुबह के गीत) गाते थे। दांत किटकिटाने वाली ठंड में भी उनके माथे पर पसीने की बूंदें चमकती थीं। उनकी यह कठोर साधना और अनुशासन देखकर गाँव के लोग हैरान रह जाते थे कि इस उम्र में भी यह आदमी इतना सक्रिय कैसे है।
Q7. ‘कुछ मार्मिक प्रसंगों के आधार पर यह दिखाई देता है कि बालगोबिन भगत प्रचलित सामाजिक मान्यताओं को नहीं मानते थे।’ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: (यह प्रश्न Q5 जैसा ही है, लेकिन इसे थोड़ा विस्तार से लिखा जा सकता है।) भगत सिर्फ माला जपने वाले साधु नहीं थे, वे कर्म से समाज सुधारक थे।
जब उनकी पतोहू ने जाने से मना किया और कहा “मैं आपकी सेवा करूंगी,” तो भगत ने अपनी ममता को हावी नहीं होने दिया। उन्होंने दलील दी कि “अगर तुम नहीं जाओगी, तो मैं यह घर छोड़कर चला जाऊंगा।”
उन्होंने अपनी बहू के भविष्य (जवानी) को अपने बुढ़ापे के सहारे से ज्यादा महत्व दिया।
उन्होंने समाज की परवाह नहीं की कि लोग क्या कहेंगे, बस वही किया जो मानवता और तर्क के आधार पर सही था।
Q8. बालगोबिन भगत की मृत्यु उन्हीं के अनुरूप (जैसा वे चाहते थे) कैसे हुई?
उत्तर: बालगोबिन भगत का अंत भी उनके जीवन की तरह शांत और संगीतमय रहा। वे हर साल गंगा स्नान के लिए पैदल (30 कोस दूर) जाते थे। बुढ़ापा आ चुका था, लेकिन टेक (जिद) वही थी। इस बार जब वे लौटे तो उनकी तबीयत खराब हो गई। उन्हें बुखार आने लगा, लेकिन उन्होंने अपना नित्य नियम (स्नान-ध्यान और खेती) नहीं छोड़ा। लोगों ने उन्हें आराम करने को कहा, पर वे हंसकर टाल देते। उस दिन भी उन्होंने शाम को गीत गाए, लेकिन आवाज़ बिखर रही थी जैसे तागा टूट गया हो। अगली सुबह जब लोगों ने गीत नहीं सुना, तो जाकर देखा। बालगोबिन भगत नहीं रहे, सिर्फ उनका ‘पंजर’ (शरीर) पड़ा था। वे गाते-गाते ही इस दुनिया से चले गए।
एग्जाम टिप (Pro Tip): इस पाठ से ‘मूल्य-परक’ (Value-based) प्रश्न अक्सर पूछा जाता है कि “बालगोबिन भगत के जीवन से हमें क्या प्रेरणा मिलती है?” उत्तर में लिखें: “हमें यह प्रेरणा मिलती है कि असली धर्म इंसानियत की सेवा और रूढ़ियों का विरोध करना है, न कि सिर्फ पूजा-पाठ करना। हमें अपने कर्मों में शुद्धता और जीवन में सादगी अपनानी चाहिए।”
शुभकामनाएं!