class 10 Hindi - Notes
Chapter 1 - माता का आँचल
कृतिका पाठ 1: माता का आँचल (शिवपूजन सहाय)
लेखक: शिवपूजन सहाय मूल उपन्यास: देहाती दुनिया मुख्य पात्र: भोलानाथ (बचपन का नाम: तारकेश्वर नाथ)
1. पाठ परिचय
इस पाठ में लेखक ने अपने बचपन की यादों को ताजा किया है। पिता के साथ उनका जुड़ाव बहुत गहरा था, वे उनके साथ ही सोते, जागते और खेलते थे। लेकिन कहानी का अंत यह सिद्ध करता है कि बच्चे का पिता से चाहे कितना भी प्रेम हो, विपत्ति (मुसीबत) के समय उसे असली शांति और सुरक्षा ‘माता के आँचल’ में ही मिलती है।
2. पिता के साथ बचपन और दिनचर्या

भोलानाथ का असली नाम तारकेश्वर नाथ था। पिता जी प्यार से उन्हें ‘भोलानाथ’ कहते थे।
सुबह की दिनचर्या: पिता जी सुबह उठकर उन्हें नहलाते और पूजा पर बिठा लेते। वे भोलानाथ के माथे पर ‘भभूत’ (राख) का चौड़ा तिलक लगाते, जिससे वे ‘बम-भोला’ लगते थे।
रामनामा बही: पूजा के बाद पिता जी ‘रामनामा बही’ में हजार बार ‘राम’ नाम लिखते।
मछलियों को दाना: फिर वे कागज के टुकड़ों पर ‘राम’ नाम लिखकर आटे की गोलियों में लपेटते और गंगा जी में मछलियों को खिलाने ले जाते। भोलानाथ उनके कंधे पर बैठकर जाते थे। लौटते समय पिता जी उन्हें पेड़ों की डालियों पर झूला झुलाते थे।
कुश्ती: घर आकर पिता जी भोलानाथ के साथ कुश्ती लड़ते और जानबूझकर हार जाते ताकि बच्चा खुश हो जाए। वे उनकी मूछों से खेलते थे।
3. माँ का खाना खिलाना (कौस/निवाले)
पिता जी जब बच्चे को खाना खिलाते, तो माँ को तसल्ली नहीं होती थी। वे कहती थीं- “मर्द क्या जाने बच्चों को कैसे खिलाना चाहिए? जब खाएगा बड़े-बड़े कौर, तब पाएगा दुनिया में ठौर।”
तोता-मैना का खेल: माँ दही-भात सानकर अलग-अलग तोता, मैना, कबूतर, हंस, मोर आदि के बनावटी नाम लेकर खिलाती थीं- “ले खा ले, नहीं तो उड़ जाएंगे।” बच्चा इसी खेल-खेल में पेट भर लेता था।
4. बचपन के खेल और तमाशे

भोलानाथ और उनके साथी तरह-तरह के नाटक करते थे, जिनमें केवल मिट्टी और टूटी-फूटी चीजों का इस्तेमाल होता था।
मिठाई की दुकान: ढेले को लड्डू, पत्तों को पूरी-कचौड़ियां और गीली मिट्टी को जलेबी मानकर दुकान सजाते थे। पिता जी भी ग्राहक बनकर आते और मिठाई खरीदते।
घरोंदा (घर बनाना): धूल की मेड़ दीवार बनती और तिनकों का छप्पर। दियासलाई (माचिस) की पेटियों के किवाड़ बनते।
बरात का जुलूस: कनस्तर (Tin) का तंबूरा बजता, टूटी चूहेदानी की पालकी बनती और बकरे पर चढ़कर बरात निकलती। पिता जी जब दुल्हन का मुंह देखने आते, तो बच्चे शरमाकर भाग जाते।
5. शरारतें और मूसन तिवारी
एक दिन बच्चों ने एक बूढ़े व्यक्ति ‘मूसन तिवारी’ को चिढ़ा दिया- “बुढ़वा बेईमान मांगे करेला का चोखा।” मूसन तिवारी ने स्कूल में शिकायत कर दी। गुरुजी ने भोलानाथ की खूब खबर ली। पिता जी को पता चला तो वे दौड़े आए और गुरुजी की खुशामद करके भोलानाथ को घर ले आए। रास्ते में साथी मिल गए तो भोलानाथ रोना भूलकर फिर खेलने लगे।
6. साँप का निकलना (कहानी का चरमोत्कर्ष/Climax)
एक दिन सभी बच्चे एक टीले पर चूहों के बिल में पानी डाल रहे थे।
अचानक: गणेश जी के चूहे की रक्षा के लिए शिवजी का साँप निकल आया।
भगदड़: साँप को देखकर बच्चे बदहवास होकर भागे। कोई ओंधे मुंह गिरा, किसी का सिर फूटा, किसी के दांत टूटे। भोलानाथ के पैर कांटों से छलनी हो गए और खून बहने लगा।
7. माता की गोद (सुरक्षा का अहसास)
भोलानाथ दौड़ते हुए घर आए। उस समय पिता जी ओसारे (बरामदे) में हुक्का पी रहे थे।
पिता की उपेक्षा: पिता जी ने बहुत पुकारा, बाहें फैलाईं, लेकिन भोलानाथ उनके पास नहीं रुके। वे सीधे अंदर दौड़े और माँ की गोद में जाकर छिप गए।
माँ की घबराहट: माँ ने बच्चे को कांपते और लहूलुहान देखा तो वे रोने लगीं। उन्होंने जल्दी से हल्दी पीसकर घावों पर लगाई।
निष्कर्ष: बच्चा पिता के साथ इतना समय बिताता था, लेकिन जब जान पर बनी, तो उसे पिता की बाजुएं नहीं, बल्कि माँ का आँचल (साड़ी का पल्ला) ही सबसे सुरक्षित किला लगा। यही इस पाठ का मूल संदेश है।