class 10 Hindi - Notes
Chapter 7 - संस्कृति
हिंदी (क्षितिज) पाठ 17: संस्कृति (भदंत आनंद कौसल्यायन)
लेखक: भदंत आनंद कौसल्यायन विधा: निबंध मुख्य विषय: सभ्यता और संस्कृति में अंतर।
1. पाठ परिचय
हम अक्सर ‘सभ्यता’ और ‘संस्कृति’ शब्दों का प्रयोग करते हैं, लेकिन इनका सही अर्थ नहीं जानते। लेखक का कहना है कि जो व्यक्ति किसी नई चीज़ की खोज करता है, वह ‘संस्कृत’ (Cultured) है। और जो व्यक्ति उस खोज को अपने पूर्वजों से विरासत में पाता है और उसका उपयोग करता है, वह ‘सभ्य’ (Civilized) है।
2. सुई-धागे और आग का उदाहरण
लेखक ने अपनी बात समझाने के लिए दो बहुत ही सरल उदाहरण दिए हैं:
आग का आविष्कार: जिस आदिमानव ने पहली बार पत्थरों को रगड़कर या किसी और तरीके से आग पैदा करने का उपाय सोचा होगा, वह ‘संस्कृत’ आदमी था। उसके अंदर वो ‘विशेष बुद्धि’ या ‘प्रेरणा’ थी जिसने उसे नई खोज करने के लिए उकसाया।
सुई-धागे का आविष्कार: जिस व्यक्ति ने पहली बार यह सोचा होगा कि लोहे के छोटे टुकड़े में छेद करके और धागा डालकर कपड़ों को जोड़ा जा सकता है, वह भी ‘संस्कृत’ था।
निष्कर्ष:
संस्कृति: वह मूल प्रेरणा या बुद्धि है जो किसी नई चीज़ का निर्माण करती है। (जैसे- न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण खोजा, वह ‘संस्कृत’ मानव था)।
सभ्यता: वह बाहरी वस्तु या तरीका है जो हमें संस्कृति के परिणाम स्वरूप मिलता है। (जैसे- आज हम माचिस जलाते हैं या सिलाई मशीन चलाते हैं, तो हम ‘सभ्य’ हैं, लेकिन उस आविष्कार के ‘संस्कृत’ नहीं हैं)।
3. भौतिक और आध्यात्मिक संस्कृति
संस्कृति केवल पेट भरने या तन ढकने (भौतिक जरूरतों) तक सीमित नहीं है।
मनुष्य की जिज्ञासा उसे तारों को देखने या किसी अदृश्य शक्ति को समझने के लिए भी प्रेरित करती है।
जो व्यक्ति अपना पेट भरा होने पर भी, दूसरों का पेट भरने के लिए अपना निवाला छोड़ देता है, वह भी संस्कृत है। यह मानवीय संस्कृति है।
उदाहरण:
सिद्धार्थ (गौतम बुद्ध): उन्होंने मानव जाति के दुखों को दूर करने के लिए अपना राजमहल और सुख-सुविधाएं त्याग दीं।
कार्ल मार्क्स: उन्होंने मजदूरों को सुखी देखने के लिए जीवन भर दुख सहे।
लेनिन: उन्होंने मुश्किल समय में भी अपनी रोटी के टुकड़े दूसरों को खिला दिए।
4. संस्कृति और असंस्कृति
लेखक एक महत्वपूर्ण चेतावनी देते हैं। यदि हमारी बुद्धि का उपयोग मानव कल्याण (भलाई) के लिए होता है, तो वह ‘संस्कृति’ है।
लेकिन, यदि मानव अपनी बुद्धि का उपयोग विनाशकारी हथियार (एटम बम आदि) बनाने में करता है जिससे मानव जाति का नाश हो, तो वह संस्कृति नहीं, ‘असंस्कृति’ है।
ऐसी ‘असंस्कृति’ का परिणाम ‘असभ्यता’ (विनाश) ही होगा। हमें सावधान रहना चाहिए कि हमारी सभ्यता कहीं असंस्कृति न बन जाए।
5. कूड़ा-करकट और स्थायी संस्कृति
लेखक कहते हैं कि संस्कृति कोई कूड़े का ढेर नहीं है जो जगह घेरती रहे। यह जीवन का एक सतत (Continuous) प्रवाह है।
जो सड़ी-गली परंपराएं (जैसे छुआछूत, भेदभाव) समाज को रोकती हैं, वे संस्कृति नहीं हैं।
सच्ची संस्कृति वह है जो ‘कल्याणकारी’ हो। जिसमें मानव का भला न हो, वह न तो सभ्यता है और न ही संस्कृति। उसे बदल देना चाहिए।