class 10 Hindi - Notes
Chapter 6 - नौबतखाने में इबादत
हिंदी (क्षितिज) पाठ 16: नौबतखाने में इबादत (यतीन्द्र मिश्र)
लेखक: यतीन्द्र मिश्र मुख्य पात्र: उस्ताद बिस्मिल्ला खान (भारत रत्न) मुख्य विषय: संगीत साधना और सांप्रदायिक सद्भाव।
1. पाठ परिचय
‘नौबतखाना’ का अर्थ है प्रवेश द्वार के ऊपर वह स्थान जहाँ नगाड़े/शहनाई बजाई जाती है, और ‘इबादत’ का अर्थ है पूजा। बिस्मिल्ला खान के लिए शहनाई बजाना ही ईश्वर की पूजा थी। यह पाठ हमें बताता है कि धर्म अलग होने के बावजूद संगीत कैसे सबको जोड़ता है।
2. बचपन और डुमराँव
बिस्मिल्ला खान का बचपन का नाम अमीरुद्दीन था। उनका जन्म बिहार के डुमराँव गाँव में एक संगीत प्रेमी परिवार में हुआ था।
शहनाई का रिश्ता: उनके परदादा, दादा और पिता सभी शहनाई वादक थे।
सोन नदी और नरकट: डुमराँव इसलिए प्रसिद्ध है क्योंकि वहां ‘सोन नदी’ के किनारे ‘नरकट’ (एक प्रकार की घास) मिलती है, जिसका इस्तेमाल शहनाई की ‘रीड’ (जिससे आवाज निकलती है) बनाने में होता है। 6 साल की उम्र में वे अपने ननिहाल काशी (बनारस) आ गए।
3. काशी और संगीत साधना (रियाज़)
काशी में वे अपने मामा सादिक हुसैन और अलीबख्श के पास रहे, जो बालाजी मंदिर में शहनाई बजाते थे।
रियाज़ का रास्ता: अमीरुद्दीन (बिस्मिल्ला खान) रोज बालाजी मंदिर रियाज़ करने जाते थे। उनका रास्ता रसूलन बाई और बतूलन बाई (प्रसिद्ध गायिकाएं) के घर से होकर जाता था। उन गायिकाओं की ठुमरी-टप्पा सुनकर ही उनके मन में संगीत के प्रति प्रेम जागा। वे उन्हें अपनी ‘शुरुआती गुरु’ मानते थे।
गंगा और मंदिर: वे अक्सर बालाजी मंदिर की ड्योढ़ी पर या गंगा किनारे बैठकर घंटों रियाज़ करते थे। उनके लिए गंगा मैया और बाबा विश्वनाथ उतना ही महत्व रखते थे जितना उनका अपना धर्म।
4. मुहर्रम और मातम
बिस्मिल्ला खान पक्के मुसलमान थे और नमाज पढ़ते थे, लेकिन वे कट्टर नहीं थे।

मुहर्रम: मुहर्रम के दस दिनों में उनके परिवार में कोई संगीत नहीं बजता था।
आठवीं तारीख: मुहर्रम की आठवीं तारीख उनके लिए बहुत खास होती थी। उस दिन वे पूरे शहर में पैदल चलकर, रोते हुए और शहनाई बजाते हुए दालमंडी से फातमान तक जाते थे। वे नोहा (शोक गीत) बजाते थे। उनकी आँखों से आंसू बहते रहते थे। यह दृश्य उनकी गहरी धार्मिक आस्था का प्रतीक था।
5. सुर और सादगी
बिस्मिल्ला खान को ‘भारत रत्न’ (देश का सर्वोच्च सम्मान) मिला, लेकिन वे हमेशा जमीन से जुड़े रहे।
फटी लुंगी: एक बार उनकी एक शिष्या ने उन्हें टोका- “बाबा, आपको भारत रत्न मिल चुका है, आप यह फटी हुई लुंगी (तहमत) मत पहना करें, अच्छा नहीं लगता।”
खान साहब का जवाब: उन्होंने बहुत प्यार से मुस्कुराकर कहा- “पगली! भारत रत्न हमको मिला है, हमारी लुंगी को नहीं। तुम लोगों की तरह बनाव-सिंगार में रहेंगे तो रियाज़ कब करेंगे? मालिक से यही दुआ है कि फटा सुर न बख्शे, लुंगी का क्या है, आज फटी है तो कल सिल जाएगी।” उनके लिए कपड़ों से ज्यादा कीमती उनका ‘सुर’ था।
6. काशी छोड़ने से इनकार
एक बार उन्हें अमेरिका से बहुत बड़ा प्रस्ताव मिला कि वे वहां जाकर बस जाएं और संगीत स्कूल चलाएं।
शिष्या ने कहा कि वहां हम आपके लिए बिल्कुल बनारस जैसा माहौल बना देंगे।
खान साहब का सवाल: उन्होंने पूछा- “क्या तुम वहां मेरी ‘गंगा मैया’ को भी ले आओगी?” वे कहते थे कि काशी के बिना उनका जीना संभव नहीं है। काशी उनके लिए जन्नत है।
7. निष्कर्ष: एक युग का अंत
21 अगस्त 2006 को 90 वर्ष की उम्र में बिस्मिल्ला खान का निधन हो गया।
सांस्कृतिक धरोहर: वे केवल एक संगीतकार नहीं थे, बल्कि भारत की साझा संस्कृति (गंगा-जमुनी तहज़ीब) के प्रतीक थे। वे नमाज पढ़ने के बाद काशी विश्वनाथ को प्रणाम करना नहीं भूलते थे।
शहनाई के पर्याय: आज भी जब शहनाई का नाम आता है, तो बिस्मिल्ला खान का चेहरा सामने आ जाता है।