class 10 Hindi - Notes

Chapter 5 - एक कहानी यह भी

हिंदी (क्षितिज) पाठ 14: एक कहानी यह भी (मन्नू भंडारी)

लेखिका: मन्नू भंडारी विधा: आत्मकथा (अंश) मुख्य विषय: एक साधारण लड़की का असाधारण बनने का सफर और स्वतंत्रता आंदोलन।

1. पाठ परिचय

इस पाठ में मन्नू भंडारी ने अपने किशोरावस्था (Teenage) के दिनों को याद किया है। यह कहानी केवल उनकी नहीं है, बल्कि उस दौर की हर उस लड़की की है जो 1946-47 के स्वतंत्रता आंदोलन के माहौल में अपनी पहचान तलाश रही थी। इसमें पिता के अंतर्विरोधों (Contradictions) और आजादी की लहर का सुंदर चित्रण है।


2. अजमेर का माहौल और पिता का स्वभाव

लेखिका का बचपन अजमेर (राजस्थान) के ‘ब्रह्मपुरी’ मोहल्ले में बीता। उनके पिता का स्वभाव बहुत जटिल था।

  • अतीत: वे पहले इंदौर में रहते थे, जहाँ उनकी बहुत प्रतिष्ठा थी। वे शिक्षा के प्रति बहुत जागरूक थे और कांग्रेस के सक्रिय सदस्य थे। वे दरियादिल भी थे, लेकिन आर्थिक झटके लगने के बाद वे अजमेर आ गए।

  • स्वभाव में बदलाव: अजमेर आने के बाद आर्थिक तंगी के कारण पिता बहुत क्रोधी और शक्की हो गए थे। उन्होंने अपनों से बहुत धोखा खाया था, इसलिए वे हर किसी पर शक करते थे, यहाँ तक कि अपने बच्चों पर भी।

  • रंग-भेद: पिता जी को गोरा रंग बहुत पसंद था। लेखिका बचपन में काली और दुबली-पतली थीं, जबकि उनकी बड़ी बहन ‘सुशीला’ गोरी और स्वस्थ थी। पिता जी हमेशा सुशीला की तारीफ करते थे, जिससे लेखिका के मन में बचपन से ही हीन-भावना (Inferiority Complex) घर कर गई थी। उन्हें अपनी सफलता पर भी भरोसा नहीं होता था।


3. ‘रसोई’ और पिता की सोच

पिता जी लड़कियों की शिक्षा के विरोधी नहीं थे, लेकिन वे उन्हें केवल चारदीवारी तक सीमित नहीं रखना चाहते थे।

  • भटियारखाना: पिता जी रसोईघर को ‘भटियारखाना’ कहते थे। उनका मानना था कि रसोई में रहने से लड़की की प्रतिभा और क्षमता चूल्हे-चौके में जलकर राख हो जाती है।

  • बहस: जब घर में विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के नेता आते और बहस होती, तो पिता जी मन्नू को वहां बैठने का आदेश देते। वे चाहते थे कि उनकी बेटी जाने कि देश में क्या हो रहा है। यहीं से मन्नू के मन में देशभक्ति के बीज पड़े।


4. शीला अग्रवाल का प्रभाव

कॉलेज में हिंदी प्राध्यापिका शीला अग्रवाल ने लेखिका के जीवन को नई दिशा दी।

  1. साहित्य से परिचय: शीला अग्रवाल ने उन्हें अच्छे साहित्य (जैसे- यशपाल, जैनेंद्र, अज्ञेय) को चुनकर पढ़ना सिखाया। इससे लेखिका का दायरा बढ़ा।

  2. सक्रिय राजनीति: शीला अग्रवाल ने साहित्य के साथ-साथ उन्हें देश की सक्रिय राजनीति से जोड़ा। उन्होंने मन्नू को सड़क पर भाषण देना, हड़ताल करना और जुलूस निकालना सिखाया। उनके जोश ने पिता की दी हुई आजादी की सीमाओं को तोड़ दिया।


5. पिता और पुत्री का द्वंद्व (टकराव)

लेखिका की आज़ाद ख्याली और पिता की पुरानी मर्यादाओं के बीच अक्सर टकराव होता था।

  • प्रधानाचार्या की शिकायत: एक बार कॉलेज की प्रधानाचार्या ने पिता जी को पत्र लिखकर बुलाया कि “आपकी बेटी लड़कियों को भड़का रही है, इसका कॉलेज से नाम काट दें?” पिता जी गुस्से में भन्नाते हुए कॉलेज गए। लेखिका डर के मारे पड़ोस में जा छिपीं।

  • गर्व का क्षण: जब पिता जी लौटे, तो वे गुस्से की जगह गर्व से भरे थे। उन्होंने कहा- “कॉलेज की लड़कियां मन्नू के एक इशारे पर क्लास छोड़ देती हैं। पूरा कॉलेज उसके मुट्ठी में है। यह तो देश की पुकार है, इसे कोई कैसे रोक सकता है?” लेखिका को अपनी कानों पर विश्वास नहीं हुआ।


6. आज़ादी की लहर (1947)

सन 1946-47 के दिनों में पूरा देश आज़ादी के जोश में था।

  • प्रभात फेरियां, हड़तालें और भाषणों का दौर चरम पर था।

  • अजमेर के मुख्य बाज़ार (चौपड़) पर मन्नू भंडारी ने एक धुआंधार भाषण दिया। वहां पिता जी के एक दकियानूसी मित्र ने देख लिया और घर आकर पिता जी को भड़काया कि “मन्नू की वजह से आपकी थू-थू हो रही है।”

  • लेकिन उसी रात पिता जी के एक अन्य सम्मानित मित्र (डॉ. अम्बालाल) ने आकर बधाई दी कि “मन्नू ने क्या शानदार भाषण दिया! मैंने तो गाड़ी रोककर सुना। आपको अपनी बेटी पर गर्व होना चाहिए।”

  • यह सुनकर पिता जी का चेहरा गर्व से चमक उठा। अंत में लेखिका कहती हैं कि पिता जी हमेशा दो विरोधी चीजों के बीच झूलते रहे— ‘विशिष्ट बनना’ (Famous होना) और ‘सामाजिक मर्यादा’ (समाज का डर)।

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