class 10 Hindi - Notes
Chapter 3 - लखनवी अंदाज़
हिंदी (क्षितिज) पाठ 12: लखनवी अंदाज़ (यशपाल)
लेखक: यशपाल विधा: व्यंग्य (Satire) मुख्य पात्र: लेखक और एक अज्ञात नवाब साहब
1. पाठ परिचय
यशपाल जी ने इस रचना में उस पतनशील सामंती वर्ग (Nawabs/Feudal Lords) पर कटाक्ष किया है जो अब अपनी जागीरें और रियासतें खो चुके हैं, लेकिन उनकी अकड़ और दिखावा अब भी बरकरार है। वे वास्तविकता से दूर एक बनावटी दुनिया में जीते हैं।
2. ट्रेन का डिब्बा और नवाब साहब

लेखक को पास ही कहीं जाना था। उन्होंने भीड़ से बचने और एकांत में नई कहानी के बारे में सोचने के लिए ‘सेकंड क्लास’ का टिकट ले लिया। उन्हें लगा डिब्बा खाली होगा।
दृश्य: जैसे ही लेखक डिब्बे में चढ़े, उन्होंने देखा कि वहां पहले से एक सफेदपोश सज्जन (नवाब साहब) पालथी मारकर बैठे हैं।
सामान: उनके सामने तौलिए पर दो ताजे, चिकने खीरे (Cucumbers) रखे थे।
नवाब की प्रतिक्रिया: लेखक का अचानक आ जाना नवाब साहब को अच्छा नहीं लगा। उनके चेहरे पर असंतोष दिखा। शायद उन्होंने सेकंड क्लास का टिकट इसलिए लिया था ताकि वे अकेले यात्रा कर सकें और कोई उन्हें ‘खीरे’ जैसी मामूली चीज खाते हुए न देख ले। उन्होंने लेखक से बात करने में कोई उत्साह नहीं दिखाया।
3. खीरे की तैयारी (नफासत और नज़ाकत)
काफी देर तक खिड़की से बाहर देखने के बाद, नवाब साहब ने अचानक लेखक से कहा- “आदाब-अर्ज! जनाब, खीरे का शौक फरमाएंगे?” लेखक ने उनका प्रस्ताव यह सोचकर ठुकरा दिया कि पहले तो इन्होंने भाव नहीं दिया, अब शराफत दिखा रहे हैं। लेखक ने कहा- “शुक्रिया, किबला शौक फरमाएं” (धन्यवाद, आप ही खाएं)।
इसके बाद नवाब साहब ने खीरे खाने की जो तैयारी की, वह देखने लायक थी:
पहले खीरों को खिड़की से बाहर धोया और तौलिए से पोंछा।
जेब से चाकू निकाला और खीरों के सिर काटकर उन्हें गोदकर झाग निकाला (ताकि कड़वापन दूर हो जाए)।
फिर बहुत एहतियात (सावधानी) से खीरों को छीला और पतली-पतली फांकें काटीं।
करीने से तौलिए पर सजाया और उन पर जीरा-मिला नमक और लाल मिर्च बुरक दी।
नवाब साहब के मुंह में पानी आ रहा था और बोगी में खीरे की पनियाती सुगंध फैल गई थी।
4. सूंघकर खाने की रस्म

नवाब साहब ने एक बार फिर लेखक को आमंत्रित किया- “वल्लाह, लखनऊ का बालम खीरा है!” लेकिन लेखक अपनी ‘अकड़’ (Self-respect) के कारण पहले ही मना कर चुके थे, इसलिए इस बार भी उन्होंने पेट खराब होने का बहाना बना दिया।
अब नवाब साहब ने जो किया, वह आश्चर्यजनक था:
उन्होंने खीरे की एक फांक उठाई, उसे होंठों तक ले गए।
सूंघा: फांक को सूंघा, स्वाद के आनंद में उनकी पलकें मूंद गईं।
फेंक दिया: मुंह में आए पानी को गले से नीचे उतारा और उस फांक को खिड़की से बाहर फेंक दिया।
उन्होंने एक-एक करके खीरे की सभी फांकों को सूंघा और बाहर फेंक दिया। अंत में उन्होंने तौलिए से हाथ और होंठ पोंछे और बड़े गर्व से लेखक की ओर देखा, मानो कह रहे हों- “यह है खानदानी रईसों का तरीका!”
5. डकार और ‘नई कहानी’ का जन्म
खीरे फेंकने के बाद नवाब साहब थककर लेट गए। तभी उन्हें एक गहरी डकार आई। उन्होंने लेखक की ओर देखकर कहा- “खीरा लजीज होता है, लेकिन होता है सकील (पचने में भारी), नामुराद मेदे (पेट) पर बोझ डाल देता है।”
लेखक का निष्कर्ष (The Realization): लेखक ने सोचा-
“जब खीरे को बिना खाए, केवल सूंघने से पेट भर सकता है और डकार आ सकती है, तो बिना विचार, घटना और पात्रों के ‘नई कहानी’ क्यों नहीं लिखी जा सकती?” यही इस व्यंग्य का मूल उद्देश्य है—दिखावे की संस्कृति पर चोट करना।
6. महत्वपूर्ण शब्दार्थ
मुफस्सिल: शहर के आसपास का इलाका।
सफेदपोश: भद्र पुरुष / सज्जन व्यक्ति।
नफासत: स्वच्छता / कोमलता।
सकील: जो आसानी से न पचे (गरिष्ठ)।
एहतियात: सावधानी।
सुर्खी: लाल रंग (मिर्च)।
पनियाती: रसीली / पानी वाली।vcx b
