class 10 Hindi - Notes
Chapter 2 - बालगोबिन भगत
हिंदी (क्षितिज) पाठ 2: बालगोबिन भगत (रामवृक्ष बेनीपुरी)
लेखक: रामवृक्ष बेनीपुरी विधा: रेखाचित्र मुख्य पात्र: बालगोबिन भगत
1. पाठ परिचय
इस पाठ के माध्यम से लेखक ने यह बताया है कि सन्यासी होने के लिए घर-बार छोड़कर जंगल में जाने या भगवा वस्त्र पहनने की जरूरत नहीं है। यदि कोई व्यक्ति गृहस्थ (परिवार वाला) होकर भी मोह-माया से दूर रहे, सच्चा आचरण करे और ईश्वर की भक्ति में लीन रहे, तो वह भी सन्यासी है। बालगोबिन भगत इसी विचारधारा के प्रतीक हैं।
2. बालगोबिन भगत का व्यक्तित्व (बाहरी रूप-रंग)

बालगोबिन भगत लगभग 60 वर्ष से ऊपर के मझोले कद के गोरे-चिट्टे आदमी थे।
बाल: उनके बाल पूरी तरह सफेद (पके हुए) थे। वे लंबी दाढ़ी-जटाएं नहीं रखते थे, लेकिन चेहरा हमेशा सफेद बालों से जगमगाता रहता था।
वेशभूषा: कपड़े बहुत कम पहनते थे। कमर में एक लंगोटी और सिर पर कबीरपंथियों जैसी कनफटी टोपी पहनते थे। सर्दियों में ऊपर से एक काली कमली (कंबल) ओढ़ लेते थे।
श्रृंगार: मस्तक पर हमेशा रामानंदी चंदन (जो नाक के एक छोर से शुरू होकर ऊपर तक जाता था) और गले में तुलसी की जड़ों की एक बेडौल माला पहनते थे।
3. विचारधारा और दिनचर्या
यद्यपि वे गृहस्थ थे (उनका बेटा और पतोहू थे, थोड़ी खेतीबारी थी), लेकिन उनकी आस्था कबीर में थी। वे कबीर को ही अपना ‘साहब’ (ईश्वर) मानते थे।
सत्य और ईमानदारी: वे कभी झूठ नहीं बोलते थे और सबसे खराब व्यवहार करते थे।
नियम: वे किसी की चीज को बिना पूछे नहीं छूते थे, यहाँ तक कि दूसरे के खेत में शौच के लिए भी नहीं जाते थे।
समर्पण: खेत में जो कुछ भी पैदा होता, उसे सिर पर लादकर पहले कबीरमठ ले जाते और वहां ‘भेंट’ चढ़ाते। वहां से जो कुछ ‘प्रसाद’ के रूप में वापस मिलता, उसी से अपना गुजर-बसर करते।
4. आषाढ़, भादो और कार्तिक का संगीत
लेखक ने भगत जी के संगीत का बहुत सुंदर वर्णन किया है:
आषाढ़ (वर्षा ऋतु): जब पूरा गाँव खेतों में धान की रोपाई कर रहा होता और बच्चे कीचड़ में खेल रहे होते, तब भगत जी का पूरा शरीर कीचड़ में सना होता और वे खेत में रोपनी करते हुए मधुर स्वर में गाते। उनका गीत लोगों में जोश भर देता था।
भादो (अंधेरी रात): जब मूसलाधार बारिश होती और बिजली कड़कती, तब भी भगत जी की ‘खंजड़ी’ (ढपली जैसा छोटा वाद्य यंत्र) बजती रहती थी। वे गाते थे- “गोदी में पियवा चमक उठे सखियां, चिहुंक उठे ना”।
कार्तिक (सर्दी की सुबह): भयंकर सर्दी में जब लोग कांप रहे होते, तब भगत जी भोर में (सुबह 4-5 बजे) नदी स्नान करके, पोखर के ऊंचे भिंडे पर बैठकर खंजड़ी बजाते हुए गाते थे। गाते-गाते वे इतने उत्तेजित हो जाते कि उनके माथे पर पसीना आ जाता था।
5. पुत्र की मृत्यु और अद्भुत व्यवहार

इस पाठ का सबसे मार्मिक हिस्सा उनके बेटे की मृत्यु है। उनका बेटा थोड़ा सुस्त और बोदा (कम बुद्धि वाला) था।
सिरहाने एक चिराग जला दिया और जमीन पर आसन जमाकर गीत गाने लगे।
अपनी रोती हुई पतोहू (बहू) को उन्होंने कहा- “यह रोने का नहीं, उत्सव मनाने का समय है। आत्मा परमात्मा के पास चली गई, विरहिनी अपने प्रेमी से जा मिली। इससे बड़ा आनंद और क्या होगा?”
6. समाज सुधार और क्रांतिकारी कदम
बालगोबिन भगत ने समाज की पुरानी रूढ़ियों को तोड़ा:
स्त्रियों से मुखाग्नि: बेटे के क्रिया-कर्म में उन्होंने परंपरानुसार खुद आग नहीं दी, बल्कि अपनी पतोहू से ही चिता को आग दिलवाई।
विधवा विवाह का समर्थन: श्राद्ध की अवधि पूरी होते ही उन्होंने पतोहू के भाई को बुलाया और आदेश दिया कि “इसकी दूसरी शादी कर देना।” पतोहू उन्हें छोड़कर जाना नहीं चाहती थी, वह उनकी सेवा करना चाहती थी, लेकिन भगत जी ने कहा- “अगर तू नहीं जाएगी, तो मैं ही घर छोड़कर चला जाऊंगा।” उनके इस अटल फैसले के आगे पतोहू को झुकना पड़ा।
7. मृत्यु
बालगोबिन भगत की मृत्यु भी उनके स्वभाव के अनुरूप ही शांत हुई। वे हर वर्ष गंगा स्नान करने पैदल जाते थे (जो 30 कोस दूर थी)। वे घर से खाकर निकलते और वापस आकर ही खाते। बीच में केवल पानी पीते। अंतिम समय में उनका शरीर कमजोर हो गया था, लेकिन उन्होंने अपना नियम नहीं छोड़ा। एक दिन भोर में लोगों ने उनका गीत नहीं सुना। जाकर देखा तो बालगोबिन भगत नहीं रहे, सिर्फ उनका पंजर (शरीर) पड़ा था।
जब बेटा मरा, तो उन्होंने रोना-धोना नहीं किया। उन्होंने शव को आंगन में चटाई पर लिटाकर सफेद कपड़े से ढक दिया और उस पर कुछ फूल और तुलसी दल बिखेर दिए।
