class 10 Hindi - Notes

Chapter 1 - नेताजी का चश्मा

    • हिंदी (क्षितिज) पाठ 10: नेताजी का चश्मा (स्वयं प्रकाश)

      लेखक: स्वयं प्रकाश मुख्य विषय: देशभक्ति का असली अर्थ और आम आदमी का योगदान।

      1. पाठ परिचय

      अक्सर हम सोचते हैं कि ‘देशभक्ति’ का मतलब सिर्फ फौज में भर्ती होना या नारे लगाना है। लेकिन इस कहानी में लेखक ने बताया है कि एक गरीब, बूढ़ा और दिव्यांग व्यक्ति (जिसे लोग मजाक में ‘कैप्टन’ कहते हैं) भी अपने छोटे से काम से देश के प्रति अपना प्रेम दिखा सकता है। यह कहानी हमें यह भी बताती है कि हमें देशभक्तों का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए।


      2. कहानी का विस्तृत सारांश
      (क) हालदार साहब और कस्बे का माहौल

      हालदार साहब (एक कंपनी के अधिकारी) को हर 15वें दिन काम के सिलसिले में एक छोटे से कस्बे से गुजरना पड़ता था।

      • कस्बा: कस्बा छोटा था। वहां एक लड़कों का स्कूल, एक लड़कियों का स्कूल, एक सीमेंट का छोटा कारखाना, दो ओपन सिनेमा घर और एक नगरपालिका थी।

      • नगरपालिका का काम: नगरपालिका वहां कुछ न कुछ करवाती रहती थी (सड़क पक्की करना, कबूतरों की छतरी बनवाना आदि)।

      • मूर्ति का निर्माण: एक बार नगरपालिका के किसी उत्साही अधिकारी ने सोचा कि कस्बे के मुख्य चौराहे पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की संगमरमर की मूर्ति लगवाई जाए। बजट कम होने के कारण यह काम कस्बे के ही इकलौते ड्राइंग मास्टर मोतीलाल जी को सौंपा गया।

      (ख) मूर्ति में एक कमी

      मास्टर मोतीलाल ने महीने भर में मूर्ति बनाकर तैयार कर दी। मूर्ति बहुत सुंदर थी, नेताजी फौजी वर्दी में थे और “दिल्ली चलो” या “तुम मुझे खून दो…” कहते हुए लग रहे थे।

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      • कमी: मूर्ति संगमरमर की थी, लेकिन उस पर चश्मा संगमरमर का नहीं था। शायद मास्टर साहब चश्मा बनाना भूल गए या पत्थर तराशते वक्त वह टूट गया होगा।

      • समाधान: मूर्ति पर एक सचमुच का (Real) काले फ्रेम वाला चश्मा पहना दिया गया था।

      (ग) चश्मा बदलने का रहस्य

      जब हालदार साहब पहली बार वहां से गुजरे, तो उन्होंने देखा— “वाह भाई! मूर्ति पत्थर की, लेकिन चश्मा रियल।” इसके बाद हालदार साहब जब भी वहां से गुजरते, उन्हें मूर्ति का चश्मा बदला हुआ मिलता।

      • कभी गोल फ्रेम, कभी चौकोर फ्रेम, कभी काला चश्मा।

      • हालदार साहब की जिज्ञासा (Curiosity) बढ़ गई। उन्होंने चौराहे पर बैठे पानवाले से पूछा कि नेताजी का चश्मा हर बार बदल कैसे जाता है?

      (घ) कैप्टन चश्मेवाला
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      पानवाले ने (जो मोटा और खुशमिजाज था, लेकिन हमेशा पान चबाता रहता था) बताया कि यह काम ‘कैप्टन चश्मेवाला’ करता है।

      • कौन था कैप्टन? हालदार साहब ने सोचा कोई फौजी होगा। लेकिन असल में वह एक बेहद बूढ़ा, मरियल और लंगड़ा आदमी था जो सिर पर गांधी टोपी और आंखों पर काला चश्मा लगाए रहता था। वह एक बांस पर सस्ते चश्मे टांगकर बेचता था।

      • वह ऐसा क्यों करता था? कैप्टन को नेताजी की बिना चश्मे वाली मूर्ति अच्छी नहीं लगती थी, इससे उसे दुख होता था। इसलिए वह अपनी दुकान से एक चश्मा मूर्ति पर लगा देता था। अगर किसी ग्राहक को वही चश्मा पसंद आ जाता, तो वह मूर्ति से उतारकर ग्राहक को दे देता और नेताजी को दूसरा पहना देता और माफ़ी मांग लेता।

      (ङ) पानवाले की संवेदनहीनता 

      हालदार साहब ने जब पूछा कि क्या कैप्टन ‘आज़ाद हिंद फौज’ का सिपाही था? तो पानवाले ने मजाक उड़ाते हुए कहा—

      “वो लंगड़ा क्या जाएगा फौज में? पागल है पागल! वो देखो, वो आ रहा है।” हालदार साहब को एक देशभक्त का इस तरह मजाक उड़ाया जाना बिल्कुल अच्छा नहीं लगा।

      (च) कैप्टन की मृत्यु और मायूसी

      दो साल तक यह सिलसिला चलता रहा। एक दिन हालदार साहब आए तो देखा कि मूर्ति पर कोई चश्मा नहीं था। पान की दुकान भी बंद थी। अगली बार पूछने पर पानवाले ने बहुत उदास होकर, आंखों में आंसू भरकर बताया— “साहब, कैप्टन मर गया।” हालदार साहब बहुत दुखी हुए। उन्होंने सोचा कि अब इस देश का क्या होगा जहाँ लोग देशभक्तों का मजाक उड़ाते हैं? उन्होंने तय किया कि अब वे चौराहे पर नहीं रुकेंगे और मूर्ति की तरफ देखेंगे भी नहीं, क्योंकि अब वहां चश्मा पहनाने वाला कोई नहीं बचा।

      (छ) सरकंडे का चश्मा (कहानी का अंत)

      15 दिन बाद जब हालदार साहब फिर वहां से गुजरे, तो अपनी आदत से मजबूर होकर उनकी नजर मूर्ति की तरफ उठ गई। वे चीख पड़े— “जीप रोको!” वे तेज कदमों से मूर्ति के पास गए और सावधान (Attention) की मुद्रा में खड़े हो गए।

      • क्या देखा? मूर्ति की आंखों पर सरकंडे (Reed/Straw) से बना एक छोटा सा चश्मा रखा हुआ था, जैसा अक्सर बच्चे खेल-खेल में बना लेते हैं।

      • निष्कर्ष: यह देखकर हालदार साहब की आंखें भर आईं। यह सरकंडे का चश्मा उम्मीद जगाता है कि देशभक्ति अभी भी जिंदा है। अगर बूढ़े (कैप्टन) मर गए, तो क्या हुआ, भावी पीढ़ी (बच्चों) ने नेताजी का सम्मान करना सीख लिया है।


      3. महत्वपूर्ण शब्दार्थ
      • कस्बा: गाँव से बड़ा और शहर से छोटा।

      • उहापोह: दुविधा (Confusion)।

      • द्रवित: भावुक होना (Emotional)।

      • आहत: दुखी/चोट पहुँचना।

      • मरियल: बहुत कमजोर।

      • भूतपूर्व: जो पहले था (Ex).

      • सरकंडा: एक तरह की घास/तिनका।


      4. महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर
      • प्रश्न 1: “सेनानी न होते हुए भी चश्मेवाले को लोग कैप्टन क्यों कहते थे?”

        • उत्तर: यद्यपि वह फौजी नहीं था, लेकिन उसके अंदर देशभक्ति का जज्बा फौजियों जैसा ही था। वह नेताजी का बहुत सम्मान करता था और उन्हें बिना चश्मे के नहीं देख सकता था। उसकी इसी त्याग भावना और अनुशासन के कारण लोग उसे मजाक में या सम्मान से ‘कैप्टन’ कहते थे।

      • प्रश्न 2: पानवाले का एक रेखाचित्र (Character Sketch) प्रस्तुत कीजिए।

        • उत्तर: पानवाला एक काला, मोटा और खुशमिजाज आदमी था। उसकी तोंद निकली हुई थी। वह हर वक्त पान चबाता रहता था, जिससे उसके दांत लाल-काले हो गए थे। वह व्यंग्य करने में माहिर था (कैप्टन को पागल कहना), लेकिन अंदर से वह भावुक भी था (कैप्टन की मौत पर रोना)।

      • प्रश्न 3: मूर्ति पर सरकंडे का चश्मा क्या उम्मीद जगाता है?

        • उत्तर: यह उम्मीद जगाता है कि देश का भविष्य सुरक्षित है। बच्चों के अंदर भी अपने महापुरुषों के लिए सम्मान है। देशभक्ति किसी संसाधन (पैसे/असली चश्मे) की मोहताज नहीं है, यह भावना की बात है।

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