class 10 Economics - Notes
Chapter 4 - वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था (Globalisation and the Indian Economy)
अगर आप आज बाजार जाएं, तो आपको कारों के नए-नए मॉडल, मोबाइल फोन और विदेशी ब्रांड्स के कपड़े आसानी से मिल जाएंगे। लेकिन 30 साल पहले ऐसा नहीं था। तब भारतीय सड़कों पर सिर्फ एम्बेसडर और फिएट कारें दिखती थीं। आखिर इतने कम समय में इतना बड़ा बदलाव कैसे आया? इसका जवाब है—वैश्वीकरण (Globalisation)।
1. बहुराष्ट्रीय कंपनियां (MNCs)
वैश्वीकरण को समझने से पहले हमें ‘बहुराष्ट्रीय कंपनियों’ को समझना होगा।
परिभाषा: MNC (Multinational Corporation) वह कंपनी है जिसका उत्पादन और नियंत्रण एक से अधिक देशों में होता है।
कार्यशैली: ये कंपनियां वहां अपने कारखाने या दफ्तर खोलती हैं जहां उन्हें सस्ता श्रम (Cheap Labour) और अन्य संसाधन मिलते हैं। इससे उनकी लागत (Cost) कम होती है और मुनाफा (Profit) बढ़ता है।
उदाहरण: एक अमेरिकी कंपनी अपने प्रोडक्ट का डिज़ाइन अमेरिका में बनाती है, पुर्जे (Parts) चीन में बनवाती है (सस्ते विनिर्माण के कारण), उन्हें जोड़ने (Assembling) का काम मैक्सिको या पूर्वी यूरोप में होता है, और ग्राहक सेवा (Call Centre) का काम भारत से होता है (अंग्रेजी बोलने वाले युवाओं के कारण)।
इस तरह उत्पादन प्रक्रिया टुकड़ों में बंट जाती है और पूरी दुनिया जुड़ जाती है।
2. विदेशी व्यापार और विदेशी निवेश (Foreign Trade vs Investment)
विदेशी व्यापार (Foreign Trade): जब दो देशों के बीच सामान का आयात-निर्यात होता है। यह उत्पादकों को अपने देश से बाहर निकलकर बाजार खोजने का मौका देता है।
विदेशी निवेश (Foreign Investment): जब कोई MNC किसी दूसरे देश में पैसा लगाती है (जमीन, बिल्डिंग या मशीन खरीदने के लिए), तो उसे विदेशी निवेश कहते हैं।
MNCs का स्थानीय कंपनियों के साथ जुड़ाव: MNCs तीन तरीकों से काम करती हैं:
संयुक्त उद्यम (Joint Venture): स्थानीय कंपनी के साथ मिलकर काम करना (जैसे Ford ने Mahindra के साथ किया था)। इससे स्थानीय कंपनी को नई तकनीक और पैसा मिलता है।
खरीदना (Acquisition): स्थानीय कंपनी को खरीद लेना (जैसे अमेरिकी कंपनी Cargill ने भारतीय कंपनी ‘परख फूड्स’ को खरीद लिया)।
ऑर्डर देना: छोटे उत्पादकों (जूते, कपड़े) को ऑर्डर देना और फिर अपने ब्रांड नेम से बेचना।
3. वैश्वीकरण को संभव बनाने वाले कारक
वैश्वीकरण अचानक नहीं हुआ, इसके पीछे मुख्य रूप से दो कारण हैं:
(क) प्रौद्योगिकी (Technology)
परिवहन: कंटेनर सेवाओं (Containers) के कारण भारी सामान जहाजों से बहुत कम कीमत पर दुनिया के किसी भी कोने में भेजा जा सकता है।
सूचना प्रौद्योगिकी (IT): इंटरनेट, मोबाइल और कंप्यूटर ने दुनिया को जोड़ दिया है। हम लंदन में बैठे व्यक्ति से पल भर में बात कर सकते हैं और ई-मेल भेज सकते हैं।
(ख) व्यापार उदारीकरण (Liberalisation of Trade)
व्यापार अवरोधक (Trade Barrier): सरकार विदेशी व्यापार को नियंत्रित करने के लिए आयात पर टैक्स लगाती है (जैसे- आयात कर)। इसे अवरोधक कहते हैं।
1991 की नीति: आजादी के बाद भारत ने अपने उद्योगों को बचाने के लिए विदेशी कंपनियों को रोका था। लेकिन 1991 में सरकार ने महसूस किया कि अब भारतीय कंपनियों को दुनिया से मुकाबला करना चाहिए।
उदारीकरण: सरकार द्वारा व्यापार अवरोधकों (टैक्स, पाबंदियां) को हटाने की प्रक्रिया को ‘उदारीकरण’ कहते हैं।
4. विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organization – WTO)
जब देश आपस में व्यापार करते हैं, तो नियम कौन बनाएगा?
WTO: यह एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है जिसका मुख्य उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार को उदार बनाना है। यह सुनिश्चित करता है कि देश व्यापार के नियमों का पालन करें।
आलोचना: अमीर देश (अमेरिका/यूरोप) अपने किसानों को भारी सब्सिडी देते हैं, जबकि WTO के जरिए वे विकासशील देशों (जैसे भारत) को सब्सिडी बंद करने और बाजार खोलने पर मजबूर करते हैं। यह ‘अनुचित’ है।
5. भारत पर वैश्वीकरण का प्रभाव (Impact on India)
वैश्वीकरण का असर सबके लिए एक जैसा नहीं रहा है।
सकारात्मक प्रभाव (Positive):
उपभोक्ताओं को फायदा: हमें कम कीमत पर बेहतर गुणवत्ता वाली चीजें मिल रही हैं।
नई नौकरियां: IT, सेल फोन, ऑटोमोबाइल और फास्ट फूड सेक्टर में लाखों नई नौकरियां बनी हैं।
भारतीय MNCs का उदय: वैश्वीकरण के कारण टाटा मोटर्स (गाड़ियां), इंफोसिस (IT), रैनबैक्सी (दवाएं) और एशियन पेंट्स जैसी भारतीय कंपनियां अब दुनिया भर में व्यापार कर रही हैं।
नकारात्मक प्रभाव (Negative):
छोटे उत्पादक: बैटरी, खिलौने, प्लास्टिक और टायर बनाने वाले छोटे उद्योग विदेशी कंपनियों के सस्ते माल का मुकाबला नहीं कर पाए और बंद हो गए। लाखों लोग बेरोजगार हो गए।
श्रमिकों का शोषण: प्रतिस्पर्धा के कारण बड़ी कंपनियां श्रमिकों को ‘स्थायी’ नौकरी नहीं देतीं। वे कम वेतन पर और ज्यादा घंटों तक काम करवाते हैं।
6. विशेष आर्थिक क्षेत्र (Special Economic Zones – SEZs)
विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए भारत सरकार ने SEZs बनाए हैं।
ये ऐसे औद्योगिक क्षेत्र हैं जहां विश्व स्तरीय सुविधाएं (बिजली, पानी, सड़क, परिवहन) होती हैं।
यहाँ उत्पादन इकाइयां लगाने वाली कंपनियों को शुरुआती 5 सालों तक कोई टैक्स नहीं देना पड़ता।
7. न्यायसंगत वैश्वीकरण (Fair Globalisation)
चूंकि वैश्वीकरण का फायदा अमीरों को ज्यादा मिला है और गरीबों को कम, इसलिए ‘न्यायसंगत वैश्वीकरण’ की मांग उठ रही है।
सरकार को छोटे उत्पादकों को सुरक्षा देनी चाहिए।
श्रम कानूनों का सही पालन होना चाहिए।
WTO में विकासशील देशों को मिलकर लड़ना चाहिए।